https://www.bing.com/webmasters?tid=56256cd2-0b6b-4bf5-b592-84bcc4406cf4 google.com, pub-4122156889699916, DIRECT, f08c47fec0942fa0 हमारे संस्कार और रीति -रिवाज google.com, pub-4122156889699916, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Verification: 7f7836ba4c1994c2

हमारे संस्कार और रीति -रिवाज

हमारे संस्कार और रीति -रिवाज 






काफी समय पहले की बात है| भारत का एक राज्य हरियाणा, जिसके जिला  भिवानी के एक शहर में एक सम्पन परिवार रहता था कविता की शादी हुए पन्द्रह साल के बाद उसकी जिठानी की लड़की की शादी थी | विवाह की तैयारी चल रही थी कार्ड बांटे जा रहे थे और घर आंगन में रंग रोगन का काम चल रहा था | जैसे -२ विवाह का दिन नजदीक आ रहा था सबकी बेचैनी भी उतनी बढ़ रही थी घर के सभी सदस्य बहुत खुस थे | विवाह के कामकाज को अच्छे से सम्पन कराने के लिए सभी को विवाह की कुछ जिम्मेवारी बाँट दी गयी थी |



शादी के दिन सुबह से ही शादी के सामान के साथ लोग मैरिज हाल में पहुँचने लगे | सुबह का नाश्ता और दोपहर  के खाने का बंदोबस्त हाल में ही था| कविता और उसकी देवरानी मंजू को मेहमानों के स्वागत की जिम्मेवारी दी गयी | ताकि सभी मेहमानों को आदर - सत्कार मिल सके | और किसी को कोई तकलीफ न  हो तथा किसी की  कोई शिकायत न हो शादी के बारे में

दोनों देवरानी और जेठानी (कविता - मंजू ) एक जैसी साड़ी पहन कर तैयार होने लगी | कविता ने अपनी देवरानी मंजू से कहा कि वे सिर पर साड़ी का पल्लू नहीं रखेंगी अब जमाना आगे बढ़ गया| मंजू ने कहा ठीक है दीदी - हम ऐसे ही तैयार होते हैं कबतक पुरानी परम्पराओं में पड़े रहेंगे | दोनों बहुओं में बहुत बनती थी | 

 कविता ने अपनी बड़ी बहन से कहा की दी इसबार हम सिर पर बिना पल्लू किये ही अतिथियों का स्वागत करेंगी | ताकि कुछ तो नयापन होना चाहिए कबतक इस परम्परा को निभाते रहेंगे |  यह सुनते ही कविता की बहन आरती ने कहा तुम इसघर की बहु हो और इस पल्लू से तुम्हारी एक पहचान है इससे तुम एक गुणवंती नारी कहलाती हो | ऐसे मौके पर इसे छोड़ो यह उचित नहीं है | 



आरती की सही सोच का असर कविता पर यूँ पड़ा की उसने झट से अपने सिर पर पल्लू ले लिया और मंजू को भी वैसे करने को कहा | सभी मेहमानों ने दोनों बहुओं की मेहमान नवाजी की दिलखोलकर तारीफ की |  मेहमानों के मुँह से दोनों बहुओं की तारीफ सुनकर पूरा परिवार खुशी से झूम उठा |  

कविता को उस समय अपनी दीदी की सही सोच बहुत अच्छी लगी  और उसने मन ही मन उसका धन्यवाद किया | जिन्होंने उसकी गलत सोच को सही समय पर सही दिशा दिखाकर पनपने नहीं दिया | आखिर बड़े ही छोटों को सही रास्ता दिखाते हैं  और बड़ों को ही हमारे संस्कारों का सही ज्ञान है |







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