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संघर्ष एक बच्चे का - भाग 4











             
            देव की माँ सुरजी देवी हर ग्यारह  महीने के बाद एक बच्चा पैदा कर देती इससे देव को बहुत गुस्सा आता मगर कहने के आलावा वो कुछ नहीं कर सकता था |  देव स्कूल से छुटी होने के बाद घर आता और घर में जो पशु बंधे थे उनके लिए खेत से चारा काटता और घर लाने के बाद चारा काटने वाले टोके(मशीन ) से उसको काटता और पशुओं को डालता | क्योंकि घर पंहुचते ही उसकी माँ कहती ये पशु सारा दिन से तेरी जान को रो रहे है भूखे और प्यासे, पहले इनको पानी पिलाकर ला और फिर घास लेने जाना | 

             दिन -ब -दिन देव की हालत पतली होती जा रही थी घर में सब्जी खाने के लिए उसको कोल्ड स्टोर के बाहर जो आलू बाहर फेंक देते देव उन्ही में से छांट कर आलू ले आता कभी - २ वे भी नहीं मिलते और उसदिन चावल के पानी (पीछ  जो चावल उबलने के बाद चावलों से निकल कर फेंक देते है उसी से चावल या रोटी जो भी मिलता खा लेते | 



             अगर देव मेहनत करके कुछ कमाता नहीं तो न घर में खाने के लिए अनाज होता और न ही शरीर ढ़कने के लिए कपडे होते | क्योंकि सुरजी देवी जी यानि देव की माँ को तो अपने पति को खुश करने या यों कहो कि अपनी आशकी से ही फुर्सत नहीं होती ऐसे में वह  बच्चों का ख्याल रखती |  



            देव थोड़ा बड़ा हुआ तो उसने जमींदारों की जमीं बंटाई और ठेके पर लेकर खेती की उससे देव को काफी फायदा हुआ |  लेकिन उसके लिए देव ने दिन रात मेहनत की |  गांव के लोग देव की मेहनत देखकर बहुत खुश थे और कहते कि ये लड़का बड़ा होकर जरूर कुछ करेगा |  देव ने मैट्रिक पास करली थी तब उसके बाप ने कहा की तुम साहूकार के पास मुनीम की नौकरी करलो | देव ने कहाकि उसको मुनीम की नौकरी नहीं करनी है |  क्योंकि तबतक देव टाइपिंग इंस्टिट्यूट में हिंदी और अंग्रेजी दोनों टाइपिंग सीख चुका था देव ने कई नौकरी के लिए आवेदन कर रखा था | 


            देव और उसके छोटे भाई और दो बहनें अब बड़े हो चुके थे ज़माने की थोड़ी समाज आ चुकी थी देव ने बिना किसी सिफारिश के सेना  टेस्ट पास  कर लिए थे और अब वह सेना में जाने के लिए तैयार  था एकदिन वह दूसरे गांव में अपने तायाजी के घर पर उनकी बेटी की शादी में गया हुआ था कि अचानक से उसके पास एक आदमी आया और उसका नाम पूछा कि क्या आपका नाम देव है तो देव ने कहा हाँ, मगर बात क्या है |  तब उसने कहा आपको सुबह सेना के भर्ती दफ्तर जाना है |  

             देव ने अपने बाप और माँ से कहा फिर अपनी दादी को बताया, मगर देव की बात पर कोई यकीन नहीं किया तब वह अकेला ही भर्ती दफ्तर के लिए शादी छोड़कर चल देता है | और जब वह भर्ती दफ्तर जा रहा था तो रस्ते में उसकी बस ख़राब हो जाती है मगर जैसे तैसे वह भर्ती दफ्तर पहुँच जाता है | भर्ती दफ्तर से उसको तीन दिन के बाद सेंटर में जाने के लिए तारीख मिल जाती है वह ख़ुशी -२ घर वापिस होता है वह इतना खुश था कि रस्ते में उसे बहुत जोर का बुखार हो गया |  


           देव  रास्ते में अपने रिश्तेदारों के घर चला जाता है वह वंहा पर नहीं रुकता क्योंकि बुखार बढ़ता ही जाता है वह अपने घर के लिए निकल लेता है |  घर पर वह बताने की कोशिश करता है की वह फौज में भर्ती हो गया है मगर सब उसकी इस बात को नकार देते है कि बुखार इसके दिमाग में चढ़ गया है इस लिए यह ऐसी बातें कर रहा है |  मगर तीसरे दिन वह जब जाने के लिए तैयार हो जाता है  तब देव के दादा जी पूछते है क्या बेटा देव - सच में तू भर्ती होकर जा रहा है | तब देव ने कहा हाँ , "दादा जी " |  इस बात को सुनकर दादा जी बहुत खुश होते हैं कि चल भगवान ने तेरी सुनली और इस नरक से तुझे छुटकारा मिलगया | 

          
          








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