https://draft.blogger.com/blog/post/edit/6545147327727652889/6549976125047528414 " एक अलग पहचान

एक अलग पहचान



रात के करीब 10 बजे होंगे सुलोचना के दिमाग में तरह - 2 के विचार चल रहे थे जब से उसने फेसबुक पर सिमी की पोस्ट देखा कि सिमी की पोस्ट को सरकार के राजभासा विभाग ने सिमी की काव्य संग्रह को काव्यलिपि प्रकाशन अनुदान योजना के लिए चुना है | सुलोचना की खुशी की कोई सीमा नहीं थी उसी के चलते उससे नींद कोसों दूर थी सिमी बिटिया उसके ही गांव की फौजी की बेटी थी | 

पहचान



जैसे - तैसे करके उसने उनका फोन नंबर हासिल किया और उनको बधाई देने के लिए फ़ोन करने लगी , लेकिन उनका नंबर एंगेज जा रहा थे | "कितना आगे बढ़ गई सिमी बिटिया |" सुलोचना सोचने लगी , वह भी तो इसी गांव की एक मेधावी लड़की थी | वह भी पढ़ने में काफी होशियार थी | उसे भी पढ़ - लिखकर कुछ बनना था | इस ज़माने से कुछ हासिल करना था , एक अलग पहचान बनानी थी | इसी जज्बे  से वह अपनी सहेलियों , जो अक्सर इधर-उधर गप्पें मारने में मसगूल रहती , उनको समझाया करती , "अपना समय बर्बाद मत करो, पढ़ - लिखकर कुछ कर लो | 

तुम्हारी एक अलग पहचान होनी चाहिए, ताकि तुम अपने नाम से जानी पहचानी जाओ |  तुम्हारी भी कोई पहचान  हो , यह बात सब को पता चले | लेकिन उसकी सहेलियाँ उसकी बात एक कान से सुनती और दूसरे से निकाल देती | कुछ हंसती तो कुछ उसकी बातों को बकवास बताती | 

लेकिन क्या सुलोचना भी कुछ कर पाई थी ? रिटायर्ड बाप की अविवाहित और जवान लड़की होना क्या होता है , उसकी समझ में आ चुका था इसलिए पिता के माथे की शिकन और न बढ़े , इसलिए उसने  अपनी सबसे अज़ीज ख्वाइश - आगे पढ़ने की तमन्ना को कुर्बान कर दी और चुपचाप जंहा पिता ने उसकी शादी तय की वंहा शादी कर ली | 



पहचान



एक लंबी और गहरी साँस ली सुलोचना ने, लेकिन उसकी सोच का सिलसिला टुटा नहीं | उसके होठों पर एक टेढ़ी मुस्कान फ़ैल गई | अपनी पहचान बना लेना क्या इतना आसान होता है? उसकी सहेलियाँ ही सही थीं | उपदेश देना आसान होता है , सपने बुनना भी आसान होता है , लेकिन क्या उसे हकीकत में लाना इतना आसान होता है ? बिलकुल नहीं | वह सोचने लगी , पिता के माथे की शिकन मिटाने के लिए अपने सपनों की कुर्बानी देने का जो सिलसिला उसके जीवन में शुरू हुआ , वह अब तक चलता ही रहा | हर जगह त्याग करते,समझौता करते उसका अपना कोई वजूद ही नहीं रह गया था , कोई अस्तित्व नहीं , बिना अस्तित्व के रह गई थी वह। ... | 

लेकिन विचारों की चिंगारी उसके मन में सुलगती रहती थी | इसी चिंगारी की ऊर्जा से तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच भी वह अपना रास्ता निकालने का प्रयास करने लगी थी | पढ़ाई न सही , लेकिन और भी कुछ उसके शौक थे | उसने अपनी लेखन-कला को  जीवंत किया और लिखने  सिलसिला शुरू कर दिया | धीरे -धीरे उसे लोग जानने लगे , कवि - जगत में भी उसकी पहचान बनने लगी | 

अचानक मोबाइल के बजने से उसकी तन्द्रा भांग हुई | सिमी का फ़ोन था | उसने फ़ोन रिसीव करते हुए कहा , " प्रणाम , दी | मैं सुलोचना , जी राम की बेटी...... |  सिमी बात को बीच में काटते हुए बोली , " बस -बस तुम्हारा नाम ही काफी है | मैं तुम्हे अच्छी तरह पहचानती हूँ | यँहा जब भी दो - चार लोग बैठते हैं और काव्य गोष्ठी की चर्चा होती है तो तुम्हारा नाम अवशय लिया जाता है | बहुत अच्छा लिखती हो , ऐसे ही लिखती रहो और आगे बढ़ती रहो |" 

खुशी और आस्चर्य से सिमी का मुँह खुला का खुला रह गया | उसकी आँखें भर आई | मतलब की उसकी अपनी भी कोई पहचान है | वह किसी की बेटी या किसी की पत्नी नहीं , उसका अपना भी एक वजूद है , पहचान है | 

वह एक नए जोश, स्फूर्ति और  साथ अपनी सुलोचना दी से बातें करने लगी |        




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