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बचपन और बाल - विकास ?



बचपन और  बाल - विकास? 




रात के करीब 10 बजे होंगे सब लोग रात्रि भोज करने के बाद पार्क में टहल रहे थे अंकिता का मन सुबह से ही उदास था क्योंकि दीपू की तबियत ठीक नहीं थी हॉस्टल से अंकिता के पास फ़ोन आया था एक साल  हो गया था दीपू को हॉस्टल गए हुए ,परन्तु आजतक दीपू हॉस्टल के माहौल में ढल  नहीं पाया था | शुरू - शुरू में दीपू के बहुत फ़ोन आते थे , "मम्मी , मुझे यँहा से ले जाओ | अब मैं कभी शैतानी नहीं करूँगा |" परन्तु ये सब क्या इतना आसान था | 

कितनी बार उसने अपने पति (सागर) को समझाने की कोशिश की,"कि उनका एक ही बेटा है | नौकरी ना सही, आपका ही कारोबार संभाल लेगा | उसे वापिस ले आते हैं |" 


a school boy with parents



परन्तु सागर ने कितनी बेरुखी से उसको कहा था , "क्यों लाना है तुम्हें ? अंकिता तुम कमजोर पड़ोगी तो हो चुकी उसकी पढ़ाई| पुरे साल की फीस और ना जाने किस - किससे सिफारिस करवाई तब जाकर उसको वँहा पर एडमिशन मिला | और तुम अपने साहबजादे के चार आँसू देखकर पिघल गई|"  अंकिता चुप थी| जानती थी, सागर भी अपनी जगह सही है|  कौन पिता नहीं चाहता कि उसकी सन्तान उससे बेहतर हो, अपने पिता से ज्यादा नाम कमाए|  सागर ने दीपू के दाखिले के लिए किस - किसके सामने हाथ नहीं जोड़े थे, सिर्फ उसके अच्छे भविष्य के लिए ही न | 

अंकिता, तुम्हें शायद आज मेरी बात अच्छी न लगे, परन्तु कल तुम्हारा लाडला जब अपने पैरों पर खड़ा हो जायेगा, तब तुम्हे मेरी बात याद आएगी| मैंने देखभाल कर ही हॉस्टल और स्कूल चुना है, हर चीज की सुविधा है| आस - पास के जिलों में ऐसा हॉस्टल नहीं है - बढ़िया खाना, बढ़िया पढ़ाई, सभी सुख सुविधाओं से परिपूर्ण, और क्या चाहिए|"

अंकिता ने गहरी सांस ली| क्या कहती वह सागर को? अंकिता को बचपन से फुलवारी का बहुत शौक था| शादी के घर की ज़िम्मेवारियों के बीच शौक कंही दब गया था, परन्तु दीपू के हॉस्टल जाने के बाद उसने अपने इस शौक को फिर से जिन्दा कर लिया| हर हफ्ते घर में कोई न कोई पौधा आता ही रहता| पौधों की कटाई - छँटाई, गुड़ाई - निराई और उन्हें पानी देने में उसका (अंकिता) का काफी समय निकल जाता| आज भी वह नए पौधे की तलाश में नर्सरी में आई थी |  

नर्सरी वाले ने अंकिता को देखते ही सलाम बजाया , "कैसी हो मैडम जी ? कहिये आज आपको क्या दिखाऊँ ?" अंकिता ने उसके रूबरू होते ही सवाल कर दिया , भैया तुम्हारे यँहा से जो फूल लेकर जाते हैं , वो यँहा नर्सरी में तो खिले - खिले रहते हैं , परन्तु घर ले जाने पर ना जाने क्योँ सूख जाते हैं | पिछली बार गुलाब का पौधा लेकर गई थी | कितना सुन्दर फूल खिला था एकदम सुर्ख लाल | मेरा मन उसके रंग को देख कर बस अटक कर रह गया था , परन्तु महीना भर से ज्यादा हो गया उसपर एक कली भी नहीं लगी है | खाद , पानी , धूप , खली इत्यादि सारे उपाय करके देख लिए , परन्तु बात नहीं बनी | 

gardener with his flower pot and flowers


नर्सरी वाला मुस्कराकर कहने लगा, "मैडम जी ! ये फूल - पौधे भी तो हमारी तरह ही होते हैं | इनमें भी तो जान होती है, ये भी सुख - दुःख महसूस करते हैं | चाहे कितनी भी सुख -सुविधा दे दी जाएँ , परन्तु परिवार तो परिवार ही होता है | यँहा पर ये अपने परिवार में रहते हैं , अपनों के बीच में रहते हैं | अपनों से बिछुड़ कर जीना आसान नहीं होता है |  थोड़ा समय दीजिये , वक्त के साथ ढल जायेंगे |"

अंकिता को ऐसा लगा, किसी ने कसकर उसके सीने पर मुक्का मारा | उसका घाव फिर हरा हो गया| जाने क्यों ,अंकिता को सागर और दीपू का मासूम चेहरा एकसाथ याद आ गए |




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2 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी1/5/22, 1:12 pm

    Very nice article. Achha laga aapka yeh lekh padkar.
    YouTube ke baare me bhi likho?

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  2. Jaldi hi YouTube channel ke baare me likhunga bs ek do comments aur mil jaye to jyada Acha rhega

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